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अनुभूति में शरद तैलंग की रचनाएँ

नई गज़लें
घर की कुछ चीज़ें पुरानी
जो अलमारी में

मुक्तक में
तीन मुक्तक

कविताओं में
जाने क्यों
नींद
फूलों का दर्द
लाचारी
लेखक ऐसे ही नहीं बनता है कोई 
सिलवटें

अंजुमन में
अपनी करनी
अपनी बातों में
आपका दिल
आप तो बस
आबरू वो इस तरह
इस ज़मीं पर
उस शख्स की बातों का
जब दिलों में
तलवारें
दिल के छालों
पत्थरों का अहसान
पुराने आईने में
मंज़ूर न था
यारी जो समंदर को
लड़कपन के दिन
समंदर की निशानी

गीतों में
मनवीणा के तार बजे
मेरी ओर निहारो
सीढ़ियाँ दर सीढ़ियाँ

 

जो अलमारी में

जो अलमारी में हम अख़बार के नीचे छुपाते हैं
वही कुछ चंद पैसे मुश्किलों में काम आते हैं।

कभी आँखों से अश्कों का खज़ाना कम नहीं होता
तभी तो हर खुशी हर ग़म में हम उसको लुटाते हैं।

मैं सड़कों पर गुज़रते वक़्त आँखें मूँद लेता हूँ
जो फुटपाथों पे हैं वो मुल्क की हालत बताते है।

दुआएँ दी हैं चोरों को हमेशा दो किवाड़ों ने
कि जिनके डर से ही सब उनको आपस में मिलाते हैं।

मैं अपने गाँव से जब भी शहर की ओर चलता हूँ
तो खेतों में खड़े पौधे इशारों से बुलाते हैं।

ख़ुदा हर घर में रहता है वो हम से प्यार करता है
बस इतना फ़र्क है हम उसको माँ कहकर बुलाते हैं।

'शरद' ग़ज़लों में जब भी मुल्क की तारीफ़ करता है
तो भूखे और नंगे लोग सुन कर मुस्कराते हैं।

16 मई 2007

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।