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अनुभूति में शरद तैलंग की रचनाएँ

नई गज़लें
घर की कुछ चीज़ें पुरानी
जो अलमारी में

मुक्तक में
तीन मुक्तक

कविताओं में
जाने क्यों
नींद
फूलों का दर्द
लाचारी
लेखक ऐसे ही नहीं बनता है कोई 
सिलवटें

अंजुमन में
अपनी करनी
अपनी बातों में
आपका दिल
आप तो बस
आबरू वो इस तरह
इस ज़मीं पर
उस शख्स की बातों का
जब दिलों में
तलवारें
दिल के छालों
पत्थरों का अहसान
पुराने आईने में
मंज़ूर न था
यारी जो समंदर को
लड़कपन के दिन
समंदर की निशानी

गीतों में
मनवीणा के तार बजे
मेरी ओर निहारो
सीढ़ियाँ दर सीढ़ियाँ

  मन वीणा का तार बजे

आज अगर तुम आ जाओ तो
मन वीणा का तार बजे ।

मन की तपती धरती पर फिर
प्रेम फुहार करो तुम
पथराई आँखों में खुशियों की
सौगात धरो तुम ।

शशि की निर्मल स्वच्छ चाँदनी में
मधुरिम शृंगार सजे ।

मीत प्रीत का गीत स्वरमयी
मन ही मन हम गायें
ना मैं बोलूँ ना तुम बोलो
दोनों चुप हो जायें ।

सुख के सागर खो जायें
चाहे ये संसार तजे ।

9  जून 2005


 

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