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अनुभूति में
शरद तैलंग की रचनाएँ
नई गज़लें
घर की कुछ चीज़ें पुरानी
जो अलमारी में
मुक्तक में
तीन
मुक्तक
कविताओं में
जाने क्यों
नींद
फूलों का दर्द
लाचारी
लेखक ऐसे ही नहीं बनता है कोई
सिलवटें
अंजुमन में
अपनी करनी
अपनी बातों में
आपका दिल
आप तो बस
आबरू वो इस तरह
इस ज़मीं पर
उस शख्स की बातों का
जब दिलों में
तलवारें
दिल के छालों
पत्थरों का अहसान
पुराने आईने में
मंज़ूर न था
यारी जो समंदर को
लड़कपन के दिन
समंदर की निशानी
गीतों में
मनवीणा के तार बजे
मेरी ओर निहारो
सीढ़ियाँ दर सीढ़ियाँ
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जब दिलों में
जब दिलों में प्यार का मंज़र बनेगा
देखना उस दिन ख़ुदा का घर बनेगा।
आज शर्मिंदा है ये कहते हुए मां
मेरा बेटा एक दिन अफ़सर बनेगा।
बन गया लीडर वो अपने मुल्क का
कुण्डली में था कि वो तस्कर बनेगा।
बाप ने भी सांस ले ली आख़िरी
फूल सा भाई भी अब नश्तर बनेगा।
है यकीं इक दिन खुदा देगा मुझे भी
पर न जाने कब मेरा छप्पर बनेगा।
लग गई फिर आग कच्ची बस्तियों में
सुन रहे इक सेठ का दफ़तर बनेगा।
अब भटकने का 'शरद' को डर नहीं है
उसका रहबर मील का पत्थर बनेगा।
1 जनवरी 2005
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