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अनुभूति में शास्त्री नित्य गोपाल कटारे की रचनाएँ—

नई रचना—
कलियुगी रामलीला

गीतों में—
भारती पुकारती
कविता बन रही उपहास
देख प्रकृति की ओर
सतपुड़ा के महाजंगल
साधारण इंसान
गणपति बब्बा आइयो
होशंगाबाद- वैशिष्ट्यम

अंजुमन में—
आदमी

संकलन में—
गुलमोहर- गुलमोहर के नीचे
होली है- देखो वसंत आ गया
धूप के पाँव- तीन कुंडलियाँ
प्रेम कविताएँ- जीवन दुख से भार न होता

काव्य संगम में—
संस्कृत हाइकु

  सतपुड़ा के महाजंगल

सतपुड़ा के महा जंगल थे कभी गए कहाँ जंगल
घटे जंगल कटे जंगल माफ़ियों में बटे जंगल
अए लकड़ चोरों बताओ बेच आए कहाँ जंगल

इन वनों के गए भीतर दिखे मुर्गे और न तीतर
पन्नियाँ ही पन्नियाँ बिखरी पड़ी थी उस ज़मीं पर
कहाँ गए वे हिरण कारे खा गए इंसान सारे
शेर चीते लकड़बग्घे गाँव में छुपते बेचारे
साँप अजगर थे घनेरे ले गए उनको सपेरे
तमाशा दिखला रहे हैं शहर में सायं सबेरे
नाम के ये रहे जंगल सतपुड़ा के महा जंगल

घुस न पाती थीं हवायें रोक लेती डालियाँ
अब वहाँ ट्रक घुस रह हैं और टेक्टर ट्रालियाँ
फूल पत्ते फल न छाया दूर तक कुछ नज़र आया
जानवर की जगह हमने आदमी हर जगह पाया
ले चलो हो जहाँ जंगल सतपुड़ा के महा जंगल

गौड़ भील किरात काले मोबाइल को गले डाले
धूप का चष्मा लगाए घूमते वे पेंट वाले
तुंबियों की जगह संग में प्लास्टिक के बैग धरते
ट्रांज़िस्टर लिए फिरते और डिस्को डांस करते
ढोल इनके गुम गए हैं बोल इनके गुम गए हैं
कोका कोला पेप्सी के साथ रम में रम गए हैं
अखाड़े से हुए जंगल सतपुड़ा के महा जंगल

1 अगस्त 2006 

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