अंजुमनउपहार कविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम
गौरवग्रंथ दोहेरचनाएँ भेजेंनई हवा पाठकनामा पुराने अंकसंकलन
हाइकु हास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतरसमस्यापूर्ति

 


अनुभूति में श्यामल सुमन की रचनाएँ -

नया गीत
कसक

नई कविताएँ-
इंसानियत
फ़ितरत 
संवाद

कविताओं में-
आत्मबोध
एहसास
ज़िंदगी
द्वंद्व
दर्पण
सारांश
सिफ़र का सफ़र

दोहों में-
दोहों में व्यंग्य

 

आत्मबोध

सीख सिखाना काम सरल है, करके दिखाओ तो जाने।
अपनी बारी है जब आती, लगते हैं वे पीठ दिखाने।।

हरियाली जीवन-मूल्यों की, उपवन की पतझड़-सी लगती।
स्वर्ग-नर्क का भ्रम ऐसा कि, जी लेते बस इसी बहाने।।

नहीं समस्या धर्म जगत में, उपदेशक है जड़ उलझन की।
धर्म तो है कर्तव्य आज का, पर गाते वे राग पुराने।।

वृथा न्याय की बातें हैं नित, सजती अर्थी नैतिकता की।
पहले घाव हृदय में देता, फिर आता उसको सहलाने।।

बिलख रही ममता सड़कों पर, आँगन में रोटी का क्रंदन।
कारण पूछो तो लगते हैं, पूर्व जन्म के पाप गिनाने।।

दीप ज्ञान का जलना मुश्किल, महँगी शिक्षा के इस युग में।
वे बच्चे कैसे पढ़ सकते, निकले हैं जो भूख मिटाने।।

टूट रहे हैं डोर प्रेम के, घटी चाँद की शीतलता भी।
देर हो रही कब जागोगे, सुमन लगे हैं अब मुरझाने।।

16 मई 2006

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।