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बाँटी हो जिसने तीरगी
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  बाँटी हो जिसने तीरगी

बाँटी हो जिसने तीरगी उसकी है बन्दगी
हर रोज नयी बात सिखाती है जिन्दगी

क्या फर्क रहनुमा और कातिल में है यारो
हो सामने दोनों तो लजाती है जिन्दगी

लो छिन गए खिलौने बचपन भी लुट गया
यों बोझ किताबों की दबाती है जिन्दगी

है वोट अपनी लाठी क्यों भैंस है उनकी
क्या चाल सियासत की पढाती है जिन्दगी

गिनती में सिमटी औरत पर होश है किसे
महिला दिवस मना के बढाती है जिन्दगी

किरदार चौथे खम्भे का हाथी के दाँत सा
क्यों असलियत छुपा के दिखाती है जिन्दगी

देखो सुमन की खुदकुशी टूटा जो डाल से
रंगीनियाँ कागज की सजाती है जिन्दगी

२७ अप्रैल २००९

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है