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चाहत

लगे चुराने सपन हमारे, सुनहरे सपने सजाए रखना।
कभी तीरगी खतम तो होगी, चराग़ दिल में जलाए रखना।।

खोज रहा हूँ बाज़ारों में, वो आशियाँ जो कभी था मेरा।
फिर से इक अपना घर होगा, इसी आस को जगाए रखना।।

मज़हब के रखवालों ने मिल, लूट लिया है इंसानों को।
वर्षों हमने झुकाया सर को, आज ज़रूरी उठाए रखना।।

नहीं शेष अब सहनशीलता, ह्रदय में शोले सुलग रहे हैं।
मिलें हाथ आपस में तबतक, उन शोलों को दबाए रखना।।

कई तरह की आग लगी है, हमें बचाना है उपवन को।
सभी सुमन के मान बराबर, ऐसी चाहत बचाए रखना।।

9 अक्तूबर 2007

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