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दर्पण

सब जानते शुरू से, न झूठ बोले दर्पण!
फिर देखते ही सच को, क्यों टूटता है दर्पण?

मुश्किल पता लगाना, अपनी असल शकल का!
जब सामना है होता, क्यों रूठता है दर्पण?

आँखें दिखाती दुनियाँ, क्या देख पाती खुद को?
निज आँख देखते तो, क्यों मुस्कुराता दर्पण?

कायर है होंठ कितना, कह कर भी कह न पाता।
आँखें बताती सब कुछ, और खिलखिलाता दर्पण।

मिलता कहाँ मुकम्मल, हिस्सा भी अपने हक का।
जब सच नहीं समाता, तो टूटता है दर्पण।

16 मई 2006

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