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द्वंद्व

जिसे बनाया था हमने अपना, उसी ने हमको भुला दिया
बना मसीहा जो इस वतन का, उसी ने सबको रुला दिया

बढ़े लोक और तंत्र फँसे है, ऊँचे महलों के पंजों में
वे बात करते आदर्शों की, आचरण को भुला दिया

नियम एक है प्रतिदिन का यह, कुआँ खोदकर पानी पीना
नहीं भीगती सूखी ममता, भूखे शिशु को सुला दिया

खोया है इंसान भीड़ में, मज़हब के चौराहों पर।
भरे तिजोरी मुल्ला-पंडित, नहीं किसी का भला किया

बने भगत सिंह पड़ोसी घर में, छुपी ये चाहत सभी के मन में
इसी द्वंद्व ने उपवन के सब, कली-सुमन को जला दिया।।

16 मई 2006

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