अंजुमनउपहार कविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम
गौरवग्रंथ दोहेरचनाएँ भेजेंनई हवा पाठकनामा पुराने अंकसंकलन
हाइकु हास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतरसमस्यापूर्ति

 


नई रचनाएँ-
चाहत
खिलौना

गीतों में-
कसक

नई कविताएँ-
इंसानियत
फ़ितरत 
संवाद

कविताओं में-
आत्मबोध
एहसास
ज़िंदगी
द्वंद्व
दर्पण
सारांश
सिफ़र का सफ़र

दोहों में-
दोहों में व्यंग्य

 

खिलौना

देख के नए खिलौने खुश हो जाता था बचपन में।
बना खिलौना आज देखिए अपने ही जीवन में।।

चाभी से गुड़िया चलती थी बिन चाभी अब मैं चलता।
भाव खुशी के न हो फिर भी मुस्काकर सबको छलता।।
सभी काम का समय बँटा है अपने ख़ातिर समय कहाँ।
रिश्ते नाते संबंधों का बुनते हैं नित जाल यहाँ।।
चेहरा खोज रहा हूँ अपना जा जाकर दर्पण में।
बना खिलौना आज देखिए अपने ही जीवन में।।

अलग थे रंग खिलौने के पर ढंग तो निश्चित था उनका।
रंग ढंग बदला सब अपना लगता है जीवन तिनका।।
मेरे होने का मतलब क्या अबतक समझ न पाया हूँ।।
रोटी से ज़्यादा दुनिया में ठोकर ही तो खाया हूँ।।
नहीं चाहकर खड़ी हो रहीं दीवारें आँगन में।
बना खिलौना आज देखिए अपने ही जीवन में।।

फेंक दिया करता था बाहर टूटे हुए खिलौने।
सक्षम होकर भी बाहर हूँ बिखरे स्वप्न सलोने।।
अपनापन बाँटा था जैसा वैसा ना मिल पाता है।
अब बगिया से नहीं सुमन का बाज़ारों से नाता है।।
खुशबू से ज़्यादा बदबू अब फैल रही मधुबन में।
बना खिलौना आज देखिए अपने ही जीवन में।।

9 अक्तूबर 2007

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।