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  मुझको वर दे

मुझको वर दे तू भगवान।
सबके संग मेरा उत्थान।।

और बिषमता मिटा न पाये।
मिट जाये तेरी पहचान।।

सबको रोटी देने वाले।
भूखे मरते रोज़ किसान।।

मरे सिपाही नित्य समर में।
कैप्टेन का होता गुणगान।।

जिसे कैद में होना था वे।
पाते रहते हैं सम्मान?

नीति नियम पर चलनेवाले।
समझे जाते अब नादान।।

सरकारें चलतीं हैं ऐसी।
रहती है जनता हलकान।।

बेच रही है पेट की खातिर।
भूखी जनता अब ईमान।।

तुमने ही संसार बनाया।
रोता क्यों है सकल जहान।।

सृष्टि सजाओ तुम जल्दी से।
सुमन की लौटे फिर मुस्कान।।

१७ अगस्त २००९
 

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है