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अनुभूति में श्यामल सुमन की रचनाएँ -

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बच्चे से बस्ता है भारी
मुझको वर दे तू
रोग समझकर
साथी सुख में बन जाते सब

अंजुमन में-
बाँटी हो जिसने तीरगी
मुस्कुरा के हाल कहता
मेरी यही इबादत है
रोकर मैंने हँसना सीखा
हाल पूछा आपने
 

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दोहों में-
दोहों में व्यंग्य
नेता पुराण

  रोग समझकर

रोग समझकर अपना जिसको अपनों ने धिक्कार दिया।
रीति अजब कि दिन बहुरे तो अपना कह स्वीकार किया।।

हवा के रुख संग भाव बदलना क्या इन्सानी फितरत है।
स्वागत गान सुनाया जिसको जाने पर प्रतिकार किया।।

कलम बेचने को आतुर हैं दौलत, शोहरत के आगे।
लिखना दर्द गरीबों का नित बस बौद्धिक व्यभिचार किया।।

बातें करना परिवर्तन की, समता की, नैतिकता की।
जहाँ मिला नायक को जो कुछ उसपर ही अधिकार किया।।

सुमन भी उपवन से बेहतर अब दिखते हैं बाज़ारों में।
काग़ज़ के फूलों में खुशबू क्या अच्छा व्यापार किया।।

१७ अगस्त २००९

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