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सिफ़र का सफ़र

नज़र बे-जुबाँ और जुबाँ बे-नज़र है।
इशारों को समझो तो होता असर है।।

जो मंज़िल पे पहुँचे दिखी और मंज़िल।
ये जीवन तो लगता सिफ़र का सफ़र है।।

सितारों के आगे अलग भी है दुनिया।
नज़र तो उठाओ उसी की कसर है।।

वे बातें सुनाते रहम की हमेशा।
दिखे आचरण में ज़हर ही ज़हर है।।

चमन में थे बसते सुमन संग काँटे।
ये कैसे बना हादसों का शहर है।।

16 मई 2006

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