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अनुभूति में सुधांशु उपाध्याय की रचनाएँ

गीतों में-
औरत खुलती है
काशी की गलिया
खुसरो नहीं गुज़रती रैन
दरी बिछाकर बैठे
नींद में जंगल
पोरस पड़ा घायल
बात से आगे

हुसैन के घोड़े

 

हुसैन के घोड़े

भाग रही हैं साँसें
या हंसों के जोड़े भाग रहे,
तस्वीरों से उछल हुसैन के-
घोड़े भाग रहे।

हर लमहे में नदी टूटती
दूर गगन में तारे
ठंडी भोर
उबलता पानी
छूने लगा किनारे
आस्तीन ऊपर तक बादल
मोड़े भाग रहे!

देवदार को आँधी के
आने की ख़बरें हैं
छप्पन छुरी-
जानकी बाई
गाने की ख़बरें हैं
दुहरे होते पेड़, हवा के
कोड़े भाग रहे!

संथालों की सोई बस्ती
जलती हुई मशालें हैं
और तांबई पिंडलियाँ
साँपों के
हुई हवाले हैं
चंपावन में आग लगी है, फूल
भगोड़े भाग रहे!

9 जून 2007

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