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अनुभूति में सुजीत कुमार सुमन की रचनाएँ

कविताओं में-
घर
चुनौती
चुप ही रहता हूँ
परख
भविष्य
यही है ज़िंदगी प्यारे
वर्षों बाद

 

चुनौती

तुम नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते
मेरी उपस्थिति को
तुम नकार नहीं सकते
मेरे अस्तित्व को
तुम मुझे अनदेखा भी नहीं कर सकते।

जहाँ तक भी अपनी नज़रें घुमाओगे
वहाँ तक फैला है
मेरे अस्तित्व का साम्राज्य
चाहे ट्रेन में
मूँगफली बेचता बालक हो
या महानगर की रेडलाईट पर
अख़बार लेकर दौड़ता बच्चा
चाय की दुकान पर
बरतन धोता
रगड़-रगड़ कर
टेबल चमकाने की कोशिश करता बालक।

सड़क के किनारे सुबह-सुबह
स्कूल जाते बच्चों को
कातर निगाहों से ताकता वह
या सुदूर गाँवों में
भूख से तड़पता वह।
सब तुम्हे चुनौती देते हैं
अहसास कराते हैं तुम्हे
अपनी उपस्थिति का
फुटपाथ पर जूता पॉलिश करता बालक
अकेले ही साबित करता है कि
झूठा है तुम्हारी सफलता का ग्राफ़
चुनौती देता है वह तुम्हें
और तुम्हारे सरकार को भी
कि मिटा नहीं सकते
तुम सब लोग मिलकर भी
मेरे अस्तित्व को
नकार नहीं सकते मेरी उपस्थिति को।

9 मार्च 2007

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