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अनुभूति में सुजीत कुमार सुमन की रचनाएँ

कविताओं में-
घर
चुनौती
चुप ही रहता हूँ
परख
भविष्य
यही है ज़िंदगी प्यारे
वर्षों बाद

 

परख

अपने लिए तो जीते हैं सब मगर
मर सको कभी किसी के लिए
तो समझो कि इंसान हो।

अपनी खुशी में हँसना तो आम है
ग़ैर के गम में आँखे रो दे अगर
तो समझो कि इंसान हो।

बहुत दूर तक चल सकते हो अकेले तुम
बन सको गर किसी के हमसफ़र
तो समझो कि इंसान हो।

चलकर गिरे गिरकर उठे उठकर चले तुम
कभी किसी गिरते को थाम लो
तो समझो कि इंसान हो।

अदा कर सको गर मंदिर में नमाज
मस्जिद से पुकार सको भगवान को
तो समझो कि इंसान हो।

बहुत चाहरदिवारी खड़ी कर ली है चारों ओर
एक ही घर में अगर रख सको
राम और रहमान को
गीता और कुरान को
तो समझो कि इंसान हो।

9 मार्च 2007

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