अंजुमनउपहार कविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम
गौरवग्रंथ दोहेरचनाएँ भेजेंनई हवा पाठकनामा पुराने अंकसंकलन
हाइकु हास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतरसमस्यापूर्ति

 


अनुभूति में सुनीता ठाकुर की रचनाएँ

औरत के क्षितिज से
अपने हक़ के लिए
ठहरा हुआ पानी
धरती की कोख में
प्रयास

 

प्रयास

तालाब था
काई थी
ठहराव था
लोग थे- बाँचते तालाब का इतिहास
उसकी गहराई
उसका पाना
उसकी गंदगी और
अपना प्यास कोसते,
मैं थी-
मेरी तनहाई थी
हाथों में डले थे
फेंके-
फटी परतें
और देखा - निर्मल जल
झाँकता आकाश,
अब लोग थे
पत्थर थे
फटती हुई काई थी,
प्यास ललचाई थी,
बढ़ते हाथ थे,
और मैं थी. . .

16 मार्च 2007

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।