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अनुभूति में सुशील कुमार की रचनाएँ-

विताओं में-
भीड़तंत्
हमें अपने घर लौटना है

 

हमें अपने घर लौटना है
 

हम मादरजाद बहरे- अंधे-गूंगे नहीं हैं
हमारे कान उनके भाषणों से पक गए हैं
हमारे दीदे उनकी करतूतें देख-देख फूट गए हैं
उनके तमंचों ने हमारे मुँह पर ताले जड़ दिए हैं
हम इतने ऊबे हुए और उदास हैं कि
हमें अपने घर लौटना है साथियों

वे चाहते हैं कि हमारी आशाओं का सूरज सर्वदा के लिए डूब जाए
हमसब फ़िर अपने रास्ते भूल बैठें उनकी आदिम पशुता के जंगल में
जहाँ खूंखार जानवरों से फिर हमारा सामना हो

उनके विष-दाँतों के चमक उठने के पहले
उनके चोखे पंजों की हरकतों और नीली गुर्राहटों से बच-बचा कर
रात गिरने से पहले ही
अपने-अपने घर लौट आना चाहते हैं हम सब
लेकिन अपनी मिसरी घुली बातों में वे फँसाए रखना चाहते हैं हमें

उनके शब्द जब-जब हमारे कानों में पडे़ हैं
हम सम्मोहित, विपथगामी, पतित हुए हैं और
मतिमंद हो उनके पक्ष में अपने हाथ खडे़ किए हैं

पर उनके जादुई शब्दों की तह में धँसो तो जानो,
आदमखोर जानवरों की हुंफ सुनाई देगी
इसलिए उनकी बातों के तिलस्म में मत पड़ना मेरे भाई
सिर्फ़ अपने हॄदय की सुनना
कैवल्य भाव से अपनी कोठी लौट आना
कोई तुम्हें बुला रहा है, वही तुम्हारा अपना है
बाकी धोखा है, सपना है।

दुनिया में चाहे जितनी गहरी रात पसरी हो
हमारे घरों में निरंतर आशा के दीप जलते रहते हैं
साँसों के ढोल बजते रहते हैं
ठीक वहीं लौटना है हमें, अपने शांतिनिकेतन में।
वहाँ अपने दुखों को फाँककर हम फ़कीर हो जाएँगे
और अलमस्ती के गीत गाएँगे

वहाँ से स्वयं मे जीवन भरकर
जब उनकी दुनिया मे वापस लौटेंगे हम,
उस रात के खिलाफ़ बची हुई लडा़ई की घोषणा करेंगे
जो उसने अपने शब्दों और संगीनों के साये मे
हमारे लिए रचे हैं।

१० मार्च २००८

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।

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