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अनुभूति में सुषमा भंडारी की
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दिल में हमारे

दिल में हमारे इक नई उलझन सी डाल कर
ये कौन जा रहा है यूँ दरिया खंगाल कर

ये दिल नहीं वो चीज हम यूँ बाँटते फिरें
रक्खा है हमने आज तक इसको संभाल कर

अच्छा है मेरी आँख से ये दूर ही रहें
आफ़त ही ले ली मोल कुछ ख़्वाबों को पाल कर

खोटे-खरे को तब ही तो पहचान पाओगे
देखो कहीं तो कोई तुम सिक्का उछाल कर

‘सुषमा’ नहीं तरल कि सब में ढ़ले सहज
रखना है खुद को एक ही साँचे में ढाल कर

४ फ़रवरी २००८ 

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