अंजुमनउपहार कविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम
गौरवग्रंथ दोहेरचनाएँ भेजेंनई हवा पाठकनामा पुराने अंकसंकलन
हाइकु हास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतरसमस्यापूर्ति

 


अभिव्यक्ति में विजय कुमार श्रीवास्तव 'विकल' की रचनाएँ

जीवन की साध
परिवर्तन
मधुहीन आज यौवन प्याला
मानवता की द्रौपदी
मुझे दिन में भी अंधेरा दीखता है
रात की दुल्हन
सात क्षणिकाएँ
हृदय वीणा को न जाने कौन झंकृत कर रहा है
 

 

रात की दुल्हन

रात की दुल्हन
तारों के सलमे सितारे लगी
नीलाकाश की साड़ी पहने आँखों में अमा का अंजन
और माथे पर चंद्रमा की बिंदी लगाए
धरा की सेज पर घास की मखमली चादर डाल
अपने प्रियतम की प्रतीक्षा में
ओस के आँसू बहाती रही
दिन का राजकुमार
दिवाकर के रथ पर चढ़ कर
प्रिया की तलाश में घर से निकला
प्रभात की ड्योढ़ी पर
दोनों की मुलाक़ात हुई
दिन के राजकुमार ने
अपनी भुजाओं को बढ़ा
ज्यों ही प्रिया को वक्षस्थल से लगाने की कोशिश की
उषा नामक सखी
सुनहरी चादर ओढ़े
दोनों के बीच खड़ी हो गई
रात्रिवधू अभिसार की अतृप्त प्यास लिए
अपने महल को चली गई
और जीवन पर्यंत आँसू बहाती रही
उषा को अपनी सखी की बेबसी पर
कभी दया नहीं आई
और वह अपनी सुनहली चादर का पर्दा
दोनों के बीच डालती रही
निशारानी अपने प्रियतम से मिलने की आशा में
निरंतर ही अपनी भुजाओं को फैलाती है
पर निराश हो आँसुओं के कुछ मोती
धरा की सेज पर डाल वापस चली जाती हैं।

24 फरवरी 2007

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।