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परछाइयों के पीछे-पीछे

व्यर्थ परछाइयों के पीछे-पीछे
भागती रही थी मैं
बरसों बरस,
लाभ हानि, नफ़ा नुकसान
दुनियादारी के तमाम प्रलोभनों
को बहुत पीछे छोड़ कर।

हर परछाई,
खंडहरों के क़रीब ला कर
छोड़ती रही
अनेकों अनेक खिड़कियों, दरवाज़ों
वाले खंडहरों के सामने।
जहाँ हवाओं को भी सीधा और साफ़
रास्ता नहीं मिला था
बाहर निकलने के जद्दोजहद में
दीवारों से सिर टकरा-टकरा
कर दम तोड़ती हवाओं को मैंने देखा है।

हर दरवाज़े पर
एक-सी मुहर
एक-सी पहचान।
भीतर भयावह अँधेरा का बसेरा
गरदन पकड़ती घुटन
अवसाद में डूबी हुई उमस।

बड़ी कोशिशों के बाद
खंडहरों के गिरफ्त से
बहुत दूर निकल जाती हूँ।
तभी फिर एक नई परछाई
पवित्रता का उज्जवल बाना ओढ़
कर अलग आकर्षण
के साथ खड़ी नज़र आती है।

शायद अब की बार
फिर किसी परछाई के साथ
कदम मिलाती हुई चल दूँगी।

सच परछाइयों का तिलिस्म
बेहद गहरा है।

1 सितंबर 2007

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।