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अनुभूति में विपिन चौधरी की
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एक बार फिर
कितने रंग
पत्थर होती दुनिया
मेरा सरोकार मेरा संवाद
मेरा होना न होना
समर्पण

 

पत्थर होती दुनिया

मुहावरे अपने अर्थ
गढ़ने में नाकाम रहे हैं।

शब्द अपनी संवेदनाओं
की तह तक नहीं पहुँचे।

रोशनी, अँधेरों की बग़लगीर
हो गई है।

मौन चीख़ने चिल्लाने को
मजबूर हो उठा है।

अवतारों के चमकते चेहरे
स्याह पड़ने लगे हैं।

बरसों स्थापित रंग तक
चुराए जा रहें हैं।

जीवन राही को
अपनी मंज़िल नहीं मिल सकी है।

इस त्रासदी अवसाद से भरे
दुरूहपूर्ण समय में
मैं लिख रही हूँ
कविता, शायद
शब्दों के ताप से पिघल सके
पत्थर होती दुनिया।

1 दिसंबर 2006

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अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।