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अनुभूति में विपिन चौधरी की
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मेरा होना न होना
समर्पण

 

सपनों के बीच वह

कल रात
उसकी बंद आँखों ने जो
सपनों के बेल बूटे बुने हैं
बना नहीं पाएँगे वे कोई पूरी तस्वीर।
लाँघ नहीं पाएँगे वे खेत की मुँड़ेरें।

उसके सपने केवल खेत के भीतर ही
पलते, पकते और बड़े होते हैं।
दो बीघा ज़मीन से ज़्यादा
विस्तृत नहीं है उसके सपनों की
सीमा रेखा।
छुटपन से ही
उसके सपनों की हद तय हो गई थी।
वह केवल इतना ही जानता कि
दुनिया, गाँव की सीमा पर ही ख़त्म हो जाती हैं।
यह जो लंबी-सी गाड़ी है
यह किसी स्वप्न लोक की ओर जाती है।
जिसे वह देख सकता है हद से हद
शायद दौड़ कर कभी छू भी ले।
अफ़सोस,
वह नहीं जानता
सपनों का तो पूरा का पूरा आसमान होता है।

वह जीवन के उस किनारे पर है
जहाँ कई चीज़ें उस तक नहीं पहुँचती।
यह सपनों का ही दुर्भाग्य है
जिसके पास आज भी कई नींदें ऐसी हैं
जिन में वह अपने पाँव नहीं
पसार पाता।
महसूस की जा सकती है
धरती का पीड़ा भी सहज ही
कि उसके हाथ भी तंग हैं
वह कितने ही लोगों की मुस्कान में
सपनों के सभी चमकीले रंग नहीं भर सकती।

दोहराने की कोशिश करता है,
नींद में वह
अपने दो तीन सपनों को ही
बार-बार।
बहुत हद तक याद हो गए हैं
उसे अपने सभी सपने।
इन्हीं चंद सपनों के साथ ही
पूरी होगी उसकी यह जीवन यात्रा।
दुनिया के हालात देखकर
इसके अलावा आशावाद का
सुख भरा फ़ार्मुला नहीं सूझता।

1 सितंबर 2007

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