अंजुमनउपहार कविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम
गौरवग्रंथ दोहेरचनाएँ भेजेंनई हवा पाठकनामा पुराने अंकसंकलन
हाइकु हास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतरसमस्यापूर्ति

 


अनुभूति में विपिन शून्य की रचनाएँ

नई रचनाएँ
दर्द निवारक हो जाएँ
सिमटते जज़्बात
लालटेन
सफ़ेद होली
प्यार का अर्थ

कविताओं में
उम्र का पड़ाव
करवट
बाज़ार
मैं ईराक हूँ
वो जूता

 

उम्र का पड़ाव

उम्र का ये कौन सा पड़ाव है
जो बाल मेरे अब सफ़ेद हो चले।
बचपना था इक खिलौने की तरह
और कभी हुए थे हम भी मनचले।।

सौ कहानियों की इक निशानी थी
वो निशानी ही मेरी कहानी थी।
आटा, गेहूँ, दाल से थे बेख़बर
सर पे चढ़के बोलती जवानी थी।।

गिरते पड़ते ही सदा तो उठते थे
रात को ही दिन सदा समझते थे।
करवटों का साथ भी था इस तरह
जैसे अधजगे से कोई स्वप्न थे।।

कैद थी अमीरी आसमानों में
और ग़रीबी सब को लूटती रही।
कैसे लिखता देश का अधूरापन
हर कदम कलम जो टूटती रही।।

लिख दिया दीवार पे कि वोट दो
बाँट दिए पर्चे झूठी बात के।
विश्वास में वो इस ज़मीं को तोलकर
लाखों टुकड़े कर गए जज़्बात के।।

अब नहीं पड़ाव कोई आएगा
अब न काला बाल मुस्कुराएगा।
अब दीवार को नया ही रहने दो
अब नहीं जज़्बात छटपटाएगा।।

9 जनवरी 2007

इस कविता पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकविकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्रामगौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलनहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँ दिशांतरसमस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इस में प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक माह की 1–9 –16 तथा 24 तारीख को परिवर्धित होती है।