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हास्य व्यंग्य में-
आमचुनाव में
क्योंजी आप कहाँ चूके?
खूब विचार किए
नाम लिखा दाने दाने पर
बेपेंदी के लोटे
मुस्कान ये अच्छी नहीं
ये उत्सव के फूल
हम चुनाव में हार गए

 

क्योंजी आप कहाँ चूके?

आप,
आपके घर में, अनुभव पानी भरता था
अर्थ,
शब्द के साथ, खूब मनमानी करता था
ये, उपदेशक अधर, हो गए हैं सूखे-सूखे
क्योंजी आप कहाँ चूके?

दावा था
विश्वास हमारा असली बेटा है
वही आज
गैरों के द्वारे जाकर लेटा है
दीख रहे हैं उसके सारे हाथ पाँव टूटे
क्यों जी आप कहाँ चूके?

मंदिर में
जाकर बैठो, अब राम नाम गाओ
जैसे पेड़,.
लगाए थे, अब वैसे फल खाओ
जहाँ आपके फ़ोटो दीखे लोगों ने थूके
क्योंजी आप कहाँ चूके?
क्योंजी आप कहाँ चूके?

16 मई 2007

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