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बाँस के फूल
 

पुरखों वाले बाग़ में, हँसे बाँस के फूल
चौपाई पढ़ते लगे, भले बाँस के फूल

मन में हरियाली रखो, रुत चाहे प्रतिकूल
जोगी से कहते हुए, मिले बाँस के फूल

कजरे वाली कामिनी, काश इधर आ जाय
मिल लेंगे सपने लिए, गले बाँस के फूल

जाने गाढ़ी प्रीत थी, या भोली तकरार
रक्खे सेज सुहाग ने, परे बाँस के फूल

तारों के आँगन सदा, रही नज़र की छाँव
राजा के पथ में नहीं, बिछे बाँस के फूल

फूल गुलाबों के हुए, कल परसों की बात
कहना ख़त में भेज दे, खिले बाँस के फूल

अपने रुख़ में मोड़ ली, कलामहल की भीड़
इकबाने की शाख़ में, हिले बाँस के फूल

कलम गही तो लिख लिया, माँ बाबा का नाम
बचपन को कूँची मिली, रँगे बाँस के फूल

प्रेम हिंडोले जब चढ़ी, चूमे हरसिंगार
क़ुदरत के वैराग को, रुचे बाँस के फूल

- अश्विनी कुमार विष्णु 

२५ मई २०१५

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