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बाँस वन हम उगाते रहे
 

साज सज्जा घरों की बढ़ाते रहे
बाँस पौधों की बागड़ लगाते रहे

द्वार तोरण सजा बाँस मंडप डला
पुण्य अवसर पे हरदम पुजाते रहे

जन्म लेते वही चारपाई मिली
पालना बाँस शिशु को झुलाते रहे

सीख कर चल दिया बाँस गाड़ी पकड़
गेडियों पर चढ़े खेत जाते रहे

सर ढका धूप से बाँस छप्पर मढ़ा
सरहदें बाँस घर हम बनाते रहे

बाँस की किमचियों से बनाकर पतँग
गच्चियों पे चढ़े हम उड़ाते रहे

याद है मार संटी हरे बाँस की
पाठ रटना गुरु जी सिखाते रहे

बाँस लाठी लिए एक बूढ़ा चला
अर्थियाँ बाँस पर हम उठाते रहे

बंसकारों की रोजी चले बाँस पर
टोकनी सूप डलियाँ बुनाते रहे

सारे हथियार औजार बेकाम हैं
बाँस दस्ते सभी में फँसाते रहे

साथ लाठी लिए घूमे बापू यहाँ
बेफिकर हो सफ़र ये बताते रहे

बाँस की बाँसुरी हौंठ कान्हा धरी
मोहनी धुन सुनाकर रिझाते रहे

घास के वंश का बाँस इतना बढ़ा
फुन्गियों आसमाँ वो उठाते रहे

जन्म से मौत तक बाँस ही साथ है
इसलिए बंस-वन हम उगाते रहे

- हरिवल्लभ शर्मा 

२५ मई २०१५

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