अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

खिड़की बाँस की
 

खुल गई मन-अंजुमन में, एक खिड़की बाँस की
झूमती आई गज़ल, कहने कहानी बाँस की

किस तरह साँचे ढला यह, अनगिनत हाथों गुज़र
श्रम-नगर गाथा सुनाता, हस्त शिल्पी बाँस की

वन से हरियाला चला फिर, खूब इसे छीला गया
इस तरह चौके बिछी, चिकनी चटाई बाँस की

सिर चढ़ा सोफा चिढ़ाता, जब उसे तो फ़ख्र से
हम किसी से कम नहीं, कहती है कुर्सी बाँस की

गाँव-शहरों से अलग, हर लोभ लालच से परे
दे रही आकार इन्हें, फ़नकार बस्ती बाँस की

रस-ऋचाओं से नवाज़ा, गीत-कविता ने इसे
शायरी ने भी बजाई, खूब बंसी बाँस की

करके हत्या, वन-निहत्थों की मगन हैं आरियाँ
हत हुई है साधना, तपते तपस्वी बाँस की

इस नियामत की हिफाज़त ‘कल्पना’ मिलकर करें
रह न जाए सिर्फ पन्नों, पर निशानी बाँस की

- कल्पना रामानी 

२५ मई २०१५

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter