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बाँस-सी बढ़ती गई
 

गाँठ भी पड़ती गयी, और आसमाँ चढ़ती गयी
हर समस्या आदमी की बाँस-सी बढ़ती गयी

क्या हुआ था उस महल में? क्या पता कुछ सोचिये
बाँस तो था ही नहीं पर बाँसुरी बजती गयी

नींव जैसी बन गयी लकुटी सहारा बाँस की
हाथ से लिपटी रही वह देह जब झुकती गयी

बात जब भी, की किसी से फूल जैसे भाव से
उनके शब्दों से ह्रदय में फाँस-सी गड़ती गयी

हर बुराई का नतीजा, उनको अच्छा ही मिला
काटकर हर अंग, कोई चीज नयी गढ़ती गयी

उस हवा औ' बाँस-वन की दोस्ती की क्या कहें
छेड़कर संगीत कोई, देर तक लड़ती गयी।

- पवन प्रताप सिंह 

२५ मई २०१५

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