अंजुमनउपहारकाव्य संगमगीतगौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहे पुराने अंक संकलनअभिव्यक्ति कुण्डलियाहाइकुहास्य व्यंग्यक्षणिकाएँदिशांतर

अद्भुत महिमा बाँस की
 

अद्भुत महिमा बाँस की, जाने सब संसार
करें सजावट सदन की, और करें व्यापार

कभी ईश की बाँसुरी, कभी धनुष औ' बाण
बाँस सदा से ही रहा, हर युग की पहचाण

पूर्व-धारणा मुक्त सा, है भीतर से रिक्त
जो आया, अपना लिया, बाँस प्रेम से सिक्त

जब-जब भी होये कभी, इसके तन पर छेद
तब-तब निकलीं सरगमें, जाने क्या है भेद

कर आपस में मित्रता, बाँस बढें सब साथ
बाँस-वनों के मुकुट से, सजा हिमालय माथ

वाह! नम्रता बाँस की, उन्नति का उपमान
बाल न बाँका कर सके, आँधी औ' तूफान

- परमजीतकौर 'रीत'
२५ मई २०१५

इस रचना पर अपने विचार लिखें    दूसरों के विचार पढ़ें 

अंजुमनउपहारकाव्य चर्चाकाव्य संगमकिशोर कोनागौरव ग्राम गौरवग्रंथदोहेरचनाएँ भेजें
नई हवा पाठकनामा पुराने अंक संकलन हाइकु हास्य व्यंग्य क्षणिकाएँ दिशांतर समस्यापूर्ति

© सर्वाधिकार सुरक्षित
अनुभूति व्यक्तिगत अभिरुचि की अव्यवसायिक साहित्यिक पत्रिका है। इसमें प्रकाशित सभी रचनाओं के सर्वाधिकार संबंधित लेखकों अथवा प्रकाशकों के पास सुरक्षित हैं। लेखक अथवा प्रकाशक की लिखित स्वीकृति के बिना इनके किसी भी अंश के पुनर्प्रकाशन की अनुमति नहीं है। यह पत्रिका प्रत्येक सोमवार को परिवर्धित होती है

hit counter