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सबका संगम बाँस
 

वीर. शांत, शृंगार रस, सबका संगम बाँस
धनु, मुरली, मुनि की कुटी, सबमें बाँस निवास

भौतिकता का नर हुआ, ऐसा भारी दास
पत्थर घर सम दुख बढ़े, चैन घटा सम बाँस

सुख-दुख सबमें ही रहे, सदा संग में बाँस
‘माड़ो’ शादी के समय, ‘अर्थी’ अंतिम साँस

शैशव क्षण में पालना, यौवन में घर-द्वार
वृद्धा काल में लाठी, महिमा बाँस अपार

स्वर्ण, रजत की बाँसुरी, दी जसुदा निज लाल
बाँस मुरलिया पर फिदा, लेकिन जगत भुआल

- पीयूष द्विवेदी भारत
२५ मई २०१५

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