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उजड़ रहे हैं बाँसवन
 

उजड़ रहें हैं बंसवन, हम कितने नादान
मिली संपदा यह हमें, संसृति से वरदान

बंद तिजोरी में पड़ा, वह सोना किस काम
सोना हरा लगाइये, आए कितने काम

बाँस टुकनियाँ ले चले, शीश धरे घन-श्याम
वसुदेव सँग कृष्ण जी, पहुँचे गोकुल धाम

जुड़ा जन्म से मृत्यु तक, बाँस हमारे साथ
कितने रूपों यह सजा, पड़ शिल्पी के हाथ

फैन, चटाई, सूपड़ा, खोते अब पहचान।
हाइटेक युग में भला, कहाँ बाँस का मान।

डलियाँ भेजें बाँस की, इक दूजे के द्वार।
मिलें वंश भी ब्याह में, निभा रहे परिवार।

जीवन भर उलझा रहा, बहुत कमाया दाम
अंतिम यात्रा बाँस पर, सत्य नाम बस राम

- सीमा हरिशर्मा
२५ मई २०१५

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