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क्या देखते होंगे बाँस
 

सीधे ऊँचे
आसमान की ओर
दृष्टि जमाए
क्या देखते होंगे ये बाँस
पीले पीले
रेशम सा देह
साथ साथ खड़े हुए
सुंदर घना बसेरा बनाए
ये बाँस के वन
पूरी तरह अपनी विनम्रता में समाए
धरती के छोटे-से
टुकड़े से शुरू हो कर
आसमानी ऊँचाई तक पहुँचते हुए
कहते हैं-
हाथ चाहे आकाश तक न भी पहुँचे
आकाश छूना मुश्किल नहीं है
शुद्ध इच्छाओं में बहते हुए
हम पहुँच जाते हैं
आकाश तक

- अश्विन गाँधी

१८ मई २०१५

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