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मैं बाँस बोल रहा हूँ
 

जग के सघन वन में मैंने आँखें खोली
पूरे भारत में मेरी आत्मा बस्ती है
भारत महान के उत्तरी पूर्वी सातों राज्यों में
मेरे वंशजों के योगदान से
शाश्वत हरियाली इतराती है
मेरा हर प्रौढ़ रिश्तेदार चौदह किलो से ज्यादा
प्रदूषण मुक्त प्राणवायु का संचार करता है
हाँ मैं बाँस बोल रहा हूँ
मैं उन सब का लाडला
बहुउपयोगी - सौभाग्यशाली पुत्र - सहोदर हूँ
मेरे अंगों से घर,
सजावटी समान, आचार, औजार बना के
मुझे गले लगाते हैं
मेरे पालने में कितनों का मासूम बचपन गुजरा है
फिर जवानी के सफर में
मैंने हरे भरे झुरमुटों के तले
मोहब्बत को बसते-उजड़ते देखा है
हाँ मैं बाँस बोल रहा हूँ
जब मुझ पर कुल्हाड़ी चलती है
मेरी चीख के संग आँसू बहते हैं
लेकिन मैं अपने को ढाढ़स दे
अग्नि परीक्षा में
सफल हो जात्ता हूँ
अपने लिए तो हर कोई जीता है
मैं तो परहित के लिए जीता हूँ
मैं ऊँच-नीच, अमीर-गरीब, लिंग, नस्ल का
भेदभाव नहीं करता
इंसान के अंतिम सफर में
मेरी शैय्या पर लिटाकर
मरघट ले जाते हैं।
अगर इंसान भी मेरी तरह सेवा करे
तो जग में
'शांति का नंदन वन'
खिल जाएगा

- मंजु गुप्ता 

१८ मई २०१५

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