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बाँस : दो कविताएँ
 

१. 'बहाने'

लाठियों को छीलकर
बना दिए तिनके
तिनके जुड़े और होने लगी सफाई
उसके ही अन्दर
अंधे की लाठी
उसमें ही स्वच्छता का मन्त्र
कमज़ोर होने को एक बहाने की तरह
इस्तेमाल न करने की कसम
यह एक बाँस है
इंसान की क्या कहें...

२. 'सोने की निसैनी'

बहुत दिन उस पर पाँव रख चढ़ते थे
ऊँची ताख पर रखी मिठाई तक चुपके से
छत की पुताई के वक़्त भी आती थी याद उसकी
ऊपर पहुँचाना फितरत थी उसकी
एक दिन उसी पर लगीं बाँस की कई और खपच्चियाँ
और पहुँच गए
जहाँ जाना तो सबको होता है
पर जताता कोई नहीं

- परमेश्वर फुँकवाल 

१८ मई २०१५

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