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बाँसों के जंगल
 

पुरवा के निर्झर
बाँसों से निकले
बतियाये-झूमे
हरियाये खिले
जीवन की साँसों को
नया विश्वास दे गये
लहराते वनों को
अपलक निहारा
खेतों के आँगन को
सुरों से सँवारा
मुखरित मन को
नया मधुमास दे गये
गूँजी कोयल की कूक
तो गूँजा मधुर नाद भी
हरियायी वादियों ने
किया संवाद भी
बाँसों के जंगलों को
आहटों का विन्यास दे गये
जंगल में फिर
जब हो गया मंगल
मृग-मन कस्तुरी भी
हो गया चंचल
झुरमुटी बेपंख बाँसों को
उड़ने को नया आकाश दे गये!

- डॉ सरस्वती माथुर 

१८ मई २०१५

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