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तीन छोटी कविताएँ
 


रिश्ते होते हैं
बाँस की तरह
झुकते हैं तो
रचते हैं इतिहास
तनाव धकेलता है
टूटन की ओर


मैं बाँस की हरी कमची
झुककर गढ़ती रही मैं
जो जो चाहा तुमने
पर तुमने सोख लिया
मेरा सारा हरियरपन अब
शिकायत है तुम्हें कि
मैँ चुभती हूँ तुम्हें


बचाना ही होगा
बाँस का हरियरपन
बचेगा बाँस तो
हरी भरी रहेंगी कलायें
कला का हरियरपन
जब रंग देगा
आदमी का अंतस
तब आदमी भी
हो जायेगा हरियर
बाँस की तरह

- उर्मिला शुक्ल 

१८ मई २०१५

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