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सुनो रमेसर
 

सुनो रमेसर!
जहर उगलती
वह जो चिमनी देख रहे हो
ठीक वहीँ थे बाँस छरहरे।

कल ही तो समवेत स्वरों में
चुरमुर करते
बज उठते थे, सहस चिकारे
पछुआ चलते
घुप्प अँधेरे में घंटे पर
नीरवता के
जब था घुग्घू चोट मारता
सबसे पहली
काँख दबाये हँसिया
अँगनूँ चल पड़ता था
कुटकी मलते
कंचन कलई करने को
खेतों में दुपहर
चैत मास में धँस जाती थी
अक्सर गहरे।

छप्पर छानी थूनी बन
अवलम्बन देने
रक्तपात से नहीं कुल्हाड़ी के
वे हारे
चंदा पर आतंक राहु का
सुघर चाँदनी
सप्तऋषी की खाट
व्योम मन्दाकिनि की छवि
छत पर बचपन गया देखने
इन्हीं सहारे
बँसवट की दरगाह वही
जिस पर है भट्टा
भीमकाय ट्रक ट्रैक्टर ही
अब देते पहरे।

- रामशंकर वर्मा
१८ मई २०१५

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