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बाँस हैं हम
 

पत्थरों में उग आते हैं
सीधी राहों पर जाते हैं
जोड़-तोड़ की इस दुनिया में
काम सभी के हम आते हैं
नहीं सफल के पीछे जाते
अपने ही स्वर में गाते हैं

यह न
समझो नहीं कूबत
फाँस हैं हम, बाँस हैं हम

चाली बनकर चढ़ जाते हैं
तम्बू बनकर तन जाते हैं
नश्वर माया हमें न मोहे
अरथी सँग मरघट जाते हैं
वैरागी के मन भाते हैं
लाठी बनकर मुस्काते हैं

निबल के
साथी उसी की
आस हैं हम, बाँस हैं हम

बन गेंड़ी पग बढ़वाते हैं
अगर उठें अरि भग जाते हैं
मिले ढाबा बनें खटिया
सबको भोजन करवाते हैं
थके हुए तन सो जाते हैं
सुख सपनों में खो जाते हैं

ध्वज लगा
मस्तक नवाओ
नि-धन का धन
काँस हैं हम, बाँस हैं हम

- संजीव वर्मा सलिल
१८ मई २०१५

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