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बाँस जैसे हो गए दिन
 

पड़ गई
हैं गाँठ अनगिन
बाँस जैसे हो गये दिन

आँख के आगे अचानक
उग गये है प्रश्न इतने
पंख कटकर गिर रहे हैं
और उड़ते स्याह पन्ने

फक्क
काग़ज़ के गले में
धँस रहा है विषबुझा पिन

चरमराती रीढ़ घुटनों तक
झुकाती हैं हवायें
भुन रहे नंगे बदन की
सूखती जातीं शिरायें

आज
मन्सूबे अलग हैं
रौशनी ज्यों स्याह नागिन

छेदना दिल और कहना
सात स्वर उसमें बसा है
छूटने को तीर कोई
फिर कमानी पर कसा है

दायरे
में शब्द केवल
और सब कुछ दायरे बिन

- शुभम् श्रीवास्तव 'ओम'
१८ मई २०१५

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