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मेज पर विराजता
 

मेज पर विराजता
मैं कला सँवारता
हूँ न अगर-धूम पर
कौन उसे धारता

इसलिए इबादतो
आरती अजान हूँ

सीढ़ियाँ कि सीढियाँ
हैं सदा की पीढ़ियाँ
ये किले शिखर महल
यों नहीं बने मियाँ

मौन मौन पाँख की
अनदिखी उड़ान हूँ

देवदारु भोज हो
या कि अन्य ओज हो
मैं न होड़ लूँ कभी
कब कहा कि खोज हो

साध साध कर लचक
किन्तु चिर उठान हूँ

गाँठ-गाँठ तन बिंधा
मन मगर नहीं रुँधा
बाँसुरी इसीलिए
नित रचे नई विधा

नाग नाथते बजूँ
कि रास का मचान हूँ

नेति नेति की कथा
में रची बसी प्रथा
वंश बेल जाति की
हो खुशी की या व्यथा

मैं नहीं मिथक कहीं
प्राण हूँ पुराण हूँ

नित नया जहान हूँ
एक पूर्ण संस्कृति
भू गगन वितान हूँ
ओर छोर से परे

सर्व का निशान हूँ
सर्व के समान हूँ

- वेद शर्मा
१८ मई २०१५

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