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एक बूढ़ा सा है बरगद
 

 






 

एक बूढ़ा सा है बरगद गाँव में
हम जरा बैठेंगे इसकी छाँव में

हो शिनाख्त लूट्ने वाले की कैसे,
सच के पहने हैं मुखौटे एक जैसे
बैठ कर कर लेंगे कोई मशवरा
देगा कोई तो हमें ये रास्ता,
आ पड़े हैं आज इसके पाँव में
एक बूढ़ा सा है बरगद गाँव में

किसलिए सब ने ही धारे मौन हैं,
देश कतरे सबको मालुम कौन हैं
है सज़ा देना इन्हे मुश्किल सा काम
पर कसे थोड़ी मगर इन पर लगाम
दम दिखा इस दरख्त की जटाओं में
एक बूढ़ा सा है बरगद गाँव में.

लाचारी की है बढ़ी गर्मी बहुत
कम बचा इख्लाक बेशर्मी बहुत
इसकी छाँहों में मिली राहत बड़ी
इसके जैसों की जरूरत है बड़ी
माँगूँ लंबी उम्र तेरी दुआओं में
एक बूढ़ा सा है बरगद गाँव में.

-चंदन
६ जून २०११

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