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बरगद
 

 






 

गाँव की चौपाल का ये बरगद
कभी हमारे आँगन में होता था
जीवित थे जब
पितामह।

अनजाने
अनचीन्हे पंछी
दूर-दूर से उड कर
थक कर
पत्राच्छादित बरगद की
इस घनी शाख पर
रात-बसेरा पा जाते जब
कोलाहल समवेत स्वरों में होता मुखरित
साँझ-सवेरे
अनायास ही मुझे
याद आता वह बरगद।

और याद आती है
दादी की रसोई
जहाँ
चूल्हे पर खौलता रहता था
भात का अदहन
पसीने से भीगी लटों के मध्य
आग की लौ से दमकता
माँ का वह दीप्त चेहरा
मुझे बहुत भाता था।

चुटकी में उठा
भीगे चावल के दाने
चारों ओर घुमा कर देग के
जैसे करती हो परिक्रमा
किसी देवालय की
पहले वह चूल्हे में डालती
और फिर
उडेल देती खौलते अदहन में
परात के पूरे चावल
उसकी इन क्रियाओं का रहस्य
मैं समझ नहीं पाता
पर देखता रहता मुग्ध भाव से।

आज जब
दाल-चावल और सब्जी
एक साथ सेपरेटर्स में सेट कर
प्रेशर कूकर में चढा
पत्नी उसकी सीटी से चौंकती है
और अनमने भाव से
रसोई में जाती है
तो मुझे माँ की वह भंगिमा
बहुत याद आती है।

गाँव का वह बडा सा आँगन
सजती थी पगत जहाँ
हर साँझ
चेहरे रोज नये होते थे
पर अरहर की दाल की
उसी सौंधी खुशबू से महकता था आँगन।
बिना किसी उत्सव
बिना किसी अवसर के
इस नित्य आयोजन को
सदाव्रत कहते थे गाँव के लोग
किन्तु मैं नहीं जानता था
उसका अर्थ।

पत्नी !
जब बच्चे का होमवर्क कराती है
तो चाहता हूँ कि बताऊँ
उन शब्दों
उन क्रियाओं के अर्थ
जिन्हें मैं आज समझ पाया हूँ
किन्तु
मन-मसोस कर रह जाता हूँ
जब वह मुझे बताता है
कि उसके सिलेबस से
इन शब्दों........
क्रियाओं ........
का नहीं कोई नाता है।

मेरे घर में
नहीं है मेरे पितामह की
कोई तस्वीर।
आस-पास
कोई बरगद भी नहीं,
ड्राईंग रूम की कॉर्निश पर
रखा है केवल एक
बौनसाई।

-डॉ निर्मल शर्मा
६ जून २०११

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