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बरगद जलते हैं
 

 






 

इस जंगल में आग लगी है
बरगद जलते हैं।

भुने कबूतर शाखों से हैं
टप-टप चू पड़ते
हवन-कुंड में लपट उठे ज्यों
यों समिधा बनते

अंडे-बच्चे नहीं बचेंगे
नीड़ सुलगते हैं।

पिघला लावा भर लाई यह
जाती हुई सदी
हिरणों की आँखों में बहती
भय की एक नदी

झीलों-तालों से तेज़ाबी
बादल उठते हैं।

उजले कल की छाया ठिठकी
काले ठूँठों पर
नरक बना घुटती चीख़ों से
यह कलरव का घर

दूब उबलती, रेत पिघलती
खेत झुलसते हैं।

-डॉ. राजेन्द्र गौतम
६ जून २०११

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