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ग्रीष्म गीत
 

 






 

बरसाती मन वाले बरगद भी
जल माँग रहे
मौसम हुआ विषम

सूरज ने
यों तेवर बदले
कछुए मेंढ़क तथा केंकड़ों तक ने
घर बदले
ठूँठ हुए तरु हरियाली का
आँचल माँग रहे

भाग रहे मृग तल के पीछे
मृग पागल हो हो
बिन जल के जलजीव सभी
जल रहे विकल हो हो
खड़े हाथ जोड़े समुद्र सब
बादल माँग रहे

-पं.गिरिमोहन गुरु
६ जून २०११

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