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बरगद ने सब देखा है
 

 






 

अपनी बूढ़ी आँखों से कल बरगद ने सब देखा है
कहाँ गिरा लाजो का आँचल बरगद ने सब देखा है

तानों से तंग आकर आख़िर गाँव की मीठी पोखर ने
चुपके-चुपके ओढ़ी दलदल बरगद ने सब देखा है

मुन्सिफ़ बने हुए हैं कव्वे गिध्दों की पंचायत में
अपराधिन-सी खड़ी है कोयल बरगद ने सब देखा है

कल तक सारे मजहब जिसको अदब से शीश नवाते थे
किसने काटा है वो पीपल बरगद ने सब देखा है

मौसम जिन खेतों में आकर डेरा डाला करते थे
खेत बने वो कैसे जंगल बरगद ने सब देखा है

राजगोपाल सिंह
६ जून २०
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