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बरगद
 

 






 

सड़क किनारे खड़ा यह बरगद
देख रहा जिसे, न जाने कब वह आएगा।
कई सदियाँ बीती, सरकारें बदली, ऋतुएँ आईं
पर तटस्थ दृष्टा बन,
यह देखता ही रहा
निर्जन, उपेक्षित सा पडा,
हर पल सोचूँ यह ऐसा क्यों है
औरतें नहीं बाँधती मंगल सूत्र।
नहीं जलते धूप-दीप और न चढते नैवेद्य
क्या यह शापित है, या जाति बहिष्कृत
पक्षियों का बसेरा तो है मगर
पानी भी नहीं देता कोई
फिर भी खड़ा है झंझावातों को झेलता
शायद यही है नियति उसकी
जीना बस, जीते रहना,
बिना यह सोचे कि कल क्या होगा।

साधना राय
६ जून २०११

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