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मैं बूढ़ा बरगद हूँ यारों
 

 






 

मैं बूढा बरगद हूँ यारों

है याद कभी मैं अंकुर था
दो पल्लव लिए लजाता था
ऊँचे वृक्षों को देख-देख-
मैं खुद पर ही शर्माता था

धीरे-धीरे मैं बड़ा हुआ
शाखें फैलीं, पंछी आये
कुछ जल्दी छोड़ गए मुझको-
कुछ बना घोंसला रह पाये

मेरे कोटर में साँप एक
आ बसा हुआ मैं बहुत दुखी
चिड़ियों के अंडे खाता था-
ले गया सपेरा, किया सुखी

वानर आ करते कूद-फांद
झकझोर डालियाँ मस्ताते
बच्चे आकर झूला झूलें-
सावन में कजरी थे गाते

रातों को लगती पंचायत
उसमें आते थे बड़े-बड़े
लेकिन वे मन के छोटे थे-
झगड़े ही करते सदा खड़े

कोमल कंठी ललनाएँ आ
बन्ना-बन्नी गाया करतीं
मागरमाटी पर कर प्रणाम-
माटी लेकर जाया करतीं

मैं सबको देता आशीषें
सबको दुलराया करता था
सबके सुख-दुःख का साथी था-
सबके सँग जीता-मरता था

है काल बली, सब बदल गया
कुछ गाँव छोड़कर शहर गए
कुछ राजनीति में डूब गए-
घोलते फिजां में ज़हर गए

जंगल काटे, पर्वत खोदे
सब ताल-तलैयाँ पूर दिए
मेरे भी दुर्दिन आये हैं-
मानव मस्ती में चूर हुए

अब टूट-गिर रहीं शाखाएँ
गर्मी, जाड़ा, बरसातें भी
जाने क्यों खुशी नहीं देते?
नव मौसम आते-जाते भी

बीती यादों के साथ-साथ
अब भी हँसकर जी लेता हूँ
हर राही को छाया देता-
गुपचुप आँसू पी लेता हूँ

भूले रस्ता तो रखो याद
मैं इसकी सरहद हूँ प्यारों
दम-ख़म अब भी कुछ बाकी है-
मैं बूढा बरगद हूँ यारों

--आचार्य संजीव सलिल
६ जून २०११

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