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बरगद की छाया
 

 






 

ग्रीषम के
तपते सूरज से झुलस गयी काया।
माँ के आँचल सी लगती है
बरगद की छाया

आसमान से आग बरसती
सर झरने सूखे
शरण खोजते व्याकुल पंछी
प्यासे और भूखे

तभी गगन को
छूता सा वटवृक्ष नजर आया।
चंदन सी शीतल लगती है
बरगद की छाया

मृगमरीचिका के भ्रम में
मृगछौना भटक रहा
पर जिजीविषा के कारण
यह जीवन अटक रहा

तरुवर के नीचे
आकर फिर अजब शान्ति पाया
कितनी प्यारी प्यारी लगती
बरगद की छाया

ध्यानमग्न तप करता लगता
ॠषी मुनी जैसा
फैला बरगद हुआ गाँव से
महानगर जैसा

लाखों जीव-
जन्तुओं ने जिसका आश्रय पाया
अद्भुत सी है सबसे न्यारी
बरगद की छाया

-शास्त्री नित्यगोपाल कटारे
६ जून २०११

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