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गाँव का वह आखिरी बरगद
 

 






 

गाँव का वो आखिरी बरगद भी आखिर कट गया,
ताल जिसमे तैरते बच्चे थे, कब का पट गया।

बढ़ गए कुनबे, हुए घर तंग, रकबे बँट गए,
बढ़ गयी बाहम अदावत,नेह नाता घट गया।

धीरे धीरे आ गयी सबको सियासत की समझ,
हौले हौले आँख से सबकी अँधेरा छंट गया।

पास विद्यालय के मदिरालय का भी ठेका खुला,
चलिए विद्याकामियों का दूर हो झंझट गया।

ले के कट्टे, हो इकट्ठे, लूटने लड़के लगे,
अब बचा है कौन घर जिसमे न हो लम्पट गया।

चार कंधे भी न बूढ़े बाप को आखिर मिले,
बंध के टिकटी पर वो रिक्शे पर ही गंगा तट गया।

कल नहर पर बारियों को लेके काफी लठ बजे,
खेत सिंचने से रहा सर आदमी का फट गया।

सिद्धनाथ सिंह
६ जून २०११

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